राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सेवाओं के नियंत्रण के विवादास्पद मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार (14 फरवरी) को खंडित फैसला दिया और यह मामला वृहद पीठ के पास भेज दिया गया। बता दें कि दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच सेवाओं के नियंत्रण संबंधी मुद्दे पर टकराव की स्थिति रहती है।

Anil Baijal

समाचार एजेंसी भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ हालांकि भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, जांच आयोग गठित करने, बिजली बोर्ड पर नियंत्रण, भूमि राजस्व मामलों और लोक अभियोजकों की नियुक्ति संबंधी विवादों पर अपने विचारों पर सहमत रही।

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की उस अधिसूचना को भी बरकरार रखा कि दिल्ली सरकार का एसीबी भ्रष्टाचार के मामलों में उसके कर्मचारियों की जांच नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार उप राज्यपाल के बजाय दिल्ली सरकार के पास होगा।

वहीं, दिल्ली की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उच्चतम न्यायालय का फैसला स्पष्ट नहीं है। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए आप के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने संवाददाताओं से कहा कि दिल्ली के लोगों की परेशानियां जारी रहेंगी।

जस्टिस एके सीकरी की अगुआई वाली बेंच अफसरों की पोस्टिंग और ट्रांसफर, ऐंटी-करप्शन ब्यूरो, सरकारी सेवा आदि पर कायम गतिरोध को दूर करने के लिए याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इससे पहले कोर्ट ने पिछले साल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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